यूँ लगा कुछ खो रहा है

यूँ लगा कुछ खो रहा है कोई अपना जुदा हो रहा है
मन भी उदास हो रहा है वक़्त जो वो करीब हो रहा है
ये एहसास भी हो रहा क्यूँ ये सब हो रहा है
कोई जोर नहीं किसी का किसी पर सब लेखो का "हरमन" हिसाब हो रहा है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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