ये जो ख़ामोशी है...

ये जो ख़ामोशी है खुद तो चुप रहती है
समझने वाला समझे तो बिना बोले सब कुछ कहती है
दिल में दबी हो बात जो चेहरे के राही कहती है
सहती है कितना कुछ देखो अन्जान बनी फिर भी रहती है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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