बेरुखी से इतनी

बेरुखी से इतनी वो रुक्सत हुए और हमें भी तन्हा छोड़ गए
खुद ही था रुलाया बे-तहाशा खुद ही आंसू पोंछ गए
आप तो ना जाने वो सुखी थे मेरे दुखो से मुह मोड़ गए
ना बाँध सका फिर से हरमन धागा रिश्तो का ऐसा तोड़ गए
कलम:- हरमन बाजवा (मुस्तापुरिया )

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