मैं शिद्दत्त से ...
मैं शिद्दत्त से जिनके लिए लिखता रहा कभी गौर से उन्होंने पढ़ा ही नहीं
वो समझे हर बार कलम नयी ही थी मैंने मुद्दत्त से श्याही को भरा ही नहीं
जैसे पेड़ पर लगे हो फल बेशुमार किसी शक्श के हाथो कोई लगा ही नहीं
बाजवा अभी तो लिखना सिखा ही है इल्म शायरी का तभी तो चढ़ा ही नहीं
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )</h6>

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