अभी तो हमसफ़र साथ था
हाथो में उसके मेरा हाथ था
नजरों से नजरे मिल रही थीं
लफ्ज कहने मैं जुबान का ना साथ था
होश उड़ चुके थे कब के
फांसला दरमियाँ भी ख़ाक था
जुल्फों की बन गयी थी काली घटाए
बादल उम्मीदों का बरसने को बेताब था
कोई वजह ना थी उनके आने की
सोचा ये तो बस एक इत्तिफाक था
फिर लगा कि सब हकीकत थी
आँख खुली तो देखा हसीन ख्वाब था
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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