उनकी परछाई को अपना बनाया
दिल की दीवारों पे नाम उनका लिखवाया
हर ख़ुशी से उनको रु-ब-रु करवाया
सब दुखो को अपने हिस्से डलवाया
चाहतो के समंदर को भर के दिखाया
उम्मीदों की लहरों को उफान पर उठाया
हर कदम पर उनके हमनें खुद को बिछाया
भर कांटे अपनी राहों में फूल उनकी में सजाया
फासलों को मिटाकर था आगे बढ़ के आया
गिले-शिकवो को भी उनके था हमनें भुलाया
सहे लाखो सितम हर हाल में "बाजवा" मुस्कुराया
बावजूद इसके बेरुखी से उसने "हरमन" को ठुकराया
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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