बदनाम हुए इस कदर
के नाम भी हो गया
पहले तो छुपाता था नज़रें
अब शरेआम हो गया
पहले थी नसीहते कभी कभी
रोज का अब पैगाम हो गया
महखाने से था ना कोई वास्ता
अब लबो को सहारा-ऐ-जाम हो गया
पहले ना थी कभी फुर्सत हमें
अब वक़्त का हर पहलू गुलाम हो गया
पहले थी तमन्ना अधूरी सी
अब समंदर-ऐ-चाहत उफान हो गया
कभी रोशिनी का उजाला था हर तरफ
अब अंधेरो मैं ऐसा गुमनाम हो गया
कभी आसमान में तारे थे बेशुमार
चंद हसरतों का गुम वो चाँद हो गया
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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