उनकी अदा का जब महफ़िल मैं जिकर होता है
सीने मैं एक मीठा सा दर्द होता है
नाम आते है कईयो के फिर सामने
हर शक्श के चेहरे पर फिकर सा होता है
ना जाने किस वार से लूट लेती है ये
हर गुजरने वाला इनका मुरीद होता है
हरमन फिर गरीब कोई बेवजह से पकड़ा जाता है
असल मैं तो कत्ल इन्ही के हाथों से होता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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