चिराग तो जल रहे थे
मगर रोशिनी कहाँ थी
साँसे तो चल रही थी
मगर ज़िन्दगी कहाँ थी
आँखें तो बंद थी
मगर नींद कहाँ थी
धड़कन भी थी चल रही
मगर आवाज कहाँ थी
मंजिल तो थी सामने
रस्ते पर नज़र कहाँ थी
जिसके लिए खुद को भुला दिया
उसको खबर ही कहाँ थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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