ज़माने का देखा है ...

ज़माने का देखा है
मैंने एक दस्तूर
जिसने की कोशिश उठने की
वो दबा है बदस्तूर
समझो तो आज़ाद परिंदा है
ना समझो तो मजबूर
दिखती हो मंजिल जब सामने
होती है असल में दूर
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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