सपने में देखा तो लोग ईमान बदल रहे थे
नकली अपनी शख्शियत की पहचान बदल रहे थे
सबका बने विश्वास वो जुबान बदल रहे थे
जो सचाई के थे साथ वो पैगाम बदल रहे थे
कुछ ऐसे भी थे लोग वहां जो अरमान बदल रहे थे
ज़माने से जो खड़े थे पैरो के निशान बदल रहे थे
सब देख रह था "हरमन" पर कुछ भी न कर पाया
क्यूँ की जिनको थी उम्मीद उनके अंजाम बदल रहे थे
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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