कुछ ज़िन्दगी मेरी....
कुछ ज़िन्दगी मेरी गुज़र गयी तुम्हे अपना मुझे बनाने में
कुछ और ज़िन्दगी निकल गयी प्यार साबित करके दिखाने में
फिर गुज़रा समां ना पता लगा तुम्हे रूठे से मानाने में
बाकी बची थी जो ज़िन्दगी वो बीती मेरी महखाने में
अब देर ना कर थोडा वक़्त बचा है ऐ संग-दिल हरमन को दफ़नाने में
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )</h6>

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