दोस्तों के संग बिताये ....

दोस्तों के संग बिताये वो दिन याद आते है कॉलेज की पढाई को भी कहाँ भूल पाते है
न भूलता है वक़्त जो ऐसे ही गवाया था माँ ने पिताजी की डांट से जब हमें बचाया था
एक ही बाईक़ पर तीन तीन सवार हो जाया करते थे ना जाने कैसे कैसे करके तेल भरवाया करते थे
शहर की हर गली का चक्कर हमने जो लगाया था कितनी ही लड़कियों पर किस्मत को अजमाया था
हर कोई चली जाती थी हमसे मुह मोड़कर पर ना हार मानने का बीड़ा हमने उठाया था
सारा दिन निकलता था मौज मस्ती में सब ही तो सवार थे एक ही कश्ती में
इधर उधर घूम के सारा दिन काट लेते थे सारी खुशियाँ और गम आपस में बाँट लेते थे
हॉस्टल के रूम में महफ़िल रोज ही लगती थी वो ही पुरानी बातें करके खूब मस्ती होती थी
पूरा था भरोसा हमें दोस्तों की दोस्ती पर लड़ने को रहते थे हर वक़्त ही बेसबर
दिल करता था तो क्लास लगा लेते थे वर्ना सारा वक़्त कैंटीन में बिता देते थे
गुज़र जाता था वक़्त यूँ ही बातें करके रात को लौटते थे घर डेडी से डरते डरते
सारा साल हमारा बस यूँ ही गुज़र गया इम्तिहान भी नक़ल मार के जैसे तैसे निकल गया
फिर आया वक़्त जिसका सभी को इंतज़ार था कुछ ने कहा बस कुछ का आगे बढ़ने का विचार था
कुछ ने मनाई खुशियाँ कुछ का मातम वाला हाल था क्यूकि फिर से लगने वाला उनका एक और साल था
हम भी निकल गए भीड़ में जिसका ना हमें इतबार था ज़िन्दगी का एक नया दौर कर रहा जो इंतज़ार था
सब को अलविदा कहकर हम भी पीछे मुड़ गए जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए जान से प्यारे दोस्त मुझसे न जाने कहाँ बिछड़ गए ...
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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