साजिश है चाँद लोगो की ...

साजिश है चाँद लोगो की मुझे नीचा दिखने की
तमाम उम्र की मेहनत को धोखा बता के मिटने की
मेरी बनी बनाई हस्ती को ऊपर से निचे गिराने की
कुछ की है दुआए साथ में कुछ बद्द-दुआए भी है
कुछ खड़े है हक़ में मेरे और बहुत मेरे खिलाफ भी है
ना जाने कितनो को दगा दिया है ना किया किसी से इन्साफ भी है
बहुतों ने किया है तंग मुझे मेरी गलती का मुझे एहसास भी है
कहते है ये सब लोग मुझे के इरादे मेरे नापाक भी है
फिर भी खुदा की रहमत का शायद होना अभी एहसास भी है
मेरी सजा ना जाने कैसी होगी बाकी मिलना खुदा का अभी जवाब भी है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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