शाम होते ही महफ़िल....

शाम होते ही महफ़िल सजा लेता हूँ जाम भर के लबालब होठों से लगा लेता हूँ

नहीं होता महखाने मैं कोई और मैं खुद ही बोतल उठा लेता हूँ

होता हूँ हमेशा ही तनहा और अकेला मैं साथ पीने को दर्दो को बुला लेता हूँ

हर दर्द अपनी कहानी सुना जाता है बीता हुआ अतीत फिर से याद आ जाता है

कोशिश करता हूँ भुलाने की बहुत ना चाहते हुए भी फिर से दर्द जगा जाता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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