कल रात को मैंने सोचा ये
क्यूँ ख्वाबो की मेरे ताबीर नहीं
जो असलियत है वो तो सच ही है
फिर क्यूँ ये मुझे मंजूर नहीं
पाना चाहो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं
सब आसान है मंजिल दूर नहीं
क्यूँ रहता है कोसता खुदा को हर वक़्त
खिंची लकीर है जो वो तेरी तकदीर नहीं
बना सकता है खुद मिटा सकता है खुद
कोई शहनशाह नहीं कोई फ़कीर नहीं
दिया सब कुछ है खुदा ने इंसान को मगर
फिर क्यूँ दिखती उसे असली तस्वीर नहीं
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
Comments
Post a Comment