सुना है के वो अश्क बहाते है
रातो को हमें याद करके
सुना है वो खुद को भी जलाते है
हमारी याद में खुद को फनाह करके
सुना है वो ज़माने को ठुकराते है
हमारे मिलने की आस करके
सुना है वो रोज गली में आते है
चेहरे पे नकाब करके
सुना है वो प्यार भी जताते है
ख़त खून से अपने भरके
कुछ लोग भी हमें बताते है
इस बात का जिकर करके
और हम बेखबर उन्हें भूल जाते है
किसी गैर को याद करके
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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