ज़िन्दगी हर पल इम्तिहान लेती है
सब कोशिशे नाकाम दिखाई देती है
मुसीबतें हर तरफ से घेर लेती है
वक़्त की घड़ियाँ तन्हाई को अंजाम देती है
मैं भी आज बिल्कुल टूट सा गया हूँ
खुद को इतना अकेला क्यूँ पा रहा हूँ
कल तक तो था चिराग रोशन मगर
ढलते सूरज की तरह डूबता क्यूँ जा रहा हूँ
कुछ हालात और वक़्त की पड़ी मार ऐसी
के अब मैं इसे और न झेल पा रहा हूँ
कहते है वक़्त भर देता है हर जखम को
फिर टूटे कांच की तरह बिखरता क्यूँ जा रहा हूँ
शायद किस्मत मैं लिखा था कुछ ऐसा होना
के मुझे पड़ेगा अब तमाम उम्र ही रोना
कोई दिख नहीं रहा अपना के दर्द बाँट लूँ
उजड़ा आशियाना छोड़कर ढून्ढ रहा हूँ अब कोई कोना
सीख लेता है इंसान खुद ही की गलतियों से
ना जाने हर बार "हरमन" फैसला गलत क्यूँ लेता है
ज़िन्दगी भर करता है रहता हालातो से समझोता
जिसको पाने के लिए दौड़ता है उसे ही खो देता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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