कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
राहें भी आसान थी
मंजिल भी थी सामने
कदम लड़खड़ा गए मेरे
चाहकर भी ना चल सका
फांसले भी थे कहाँ
दूरियां मिट गयी थी
आँखों ने की शरारत थी
मैं फिर भी कुछ ना समझ सका
अन्जान था इस खेल में
खिलाडी भी तो नया था
बाज़ी भी थी मेरे हाथ में
ना उस पल को संभाल के रख सका
बीता ज़माना गुजरे हुए वक़्त को
नए दौर का आलम सता रहा था
करना तो चाहता तो शुरुआत नयी
लेकिन वक़्त ना कभी निकाल सका
कश्मकश में था यारो
फैसला ना कर सका
ना ही भूल पाया उसे
ना अपना बना के रख सका
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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