ज़ख़्म भी हमें...

ज़ख़्म भी हमें बार बार मिले गिले शिकवे भी उनके हज़ार मिले
हमनें बांटी खुशियाँ हर पल पर उनसे शिकायतों के हार मिले
हम रहे बुलाते दो पल साथ बैठने को वो रात भर किसी और के साथ बहार मिले
वक़्त रहते पता चला के वो ही बेवफा है फिर लोगो को हम ही क्यूँ गुन्हेगार मिले
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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