इश्क बोला बंदे से के मत लगा मुझे गले से
के तू फ़ना और ख़ाक हो जायेगा
बंदा बोला के छोड़ नफरत करना
आ लग जा गले से के तू भी आबाद हो जायेगा
इश्क बोला के तू जनता नहीं मेरी ताकत को
कईयो को मौत के मुंह में छोड़ा है
बंदा बोला हँस के कि मेरी हिम्मत ने भी
हवाओ के रुख को मोड़ा है
इश्क बोला के मैं इक ज़लज़ला हूँ
और कहर की तरह से बरपूंगा
बंदा बोला मैंने भी सहे है दर्द बहुत
तेरी हस्ती है क्या तुझे अपने में समो लूँगा
इश्क बोला के तेरा नमो-निशां ना रहेगा
और तू ख़ाक में मिल जायेगा
बंदा बोला के मुझे डर नहीं है मौत का
मरने के बाद भी तो सादिक आशिक ही कहलाएगा
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
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