धुआं सा उठ रह था.....

धुआं सा उठ रह था के मनो कुछ जल रह था
मेरा चमन उजाड़ गया लोगो का दिल बेहाल रह था
ना इस बात का था गुमान के अपना कोई बिछड़ रह था
बस ऐसे लग रह था मनो सांस होले होले उखड रह था
रोया था उस लम्हे को याद करके दिल अभी भी मेरा तड़प रह था
पल भर में हुआ तबाह सब कुछ ऐसे के होश मेरा अभी तक ना संभल रह था
फिरता रह हरमन बदहवास होकर ना जाने कब से भटक रह था
बदल गया जैसे सब एक ही रात में ना जाने वक़्त कैसे गुज़र रह था .
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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