मासूमियत ही तो है हथियार उनका
जिनसे रोज वो कतल करते है
बेक़सूर होते है मरने वाले
इलज़ाम फिर भी उनके सिर पड़ते है
अदा भी इस कदर से निराली है
सब हस के सूली चदते है
बाजवा वो इतने बेरहम है क्यूँ
ना जाने ये बोझ कैसे जरते है
वो करते नहीं रहम किसी पर भी
न ही खुदा के कहर का ख्याल करते है
ऐ हरमन हमें तो जीना है अभी और
तभी तो हुसन वालो से हम डरते है ..
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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