जो बनना चाहा था
वो ना कभी बन सका
और जो ना सोचा था कभी
वो आख़िरकार मैं बन गया
पर आज जो मैं बना हूँ
अपनों की मेहरबानी है
और जो कमी रह गए कहीं
अपनों की ही वो शैतानी है
खैर चलो जो भी हुआ
अब ज़िन्दगी यूँ ही बितानी है
खुद की तो बस्ती उजड़ गयी
पर औरो की मुझे बसानी है.
लेखक :-- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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