मर ही जाऊ ...

मर ही जाऊ तो अच्छा है अब जी कर क्या करूँगा
कब तक आखिर इस ज़माने से यूँ ही लड़ता रहूँगा
हिम्मत टूट गए है मेरी कोशिशे सब नाकाम है
मरने के बाद न जाने क्या होगा शायद जीना इसी का नाम है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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