सोच में फर्क पड़ जाता है
इंसान मुश्किलों में जब पड़ जाता है
निकल नहीं पाता इन गहराइयों से
इस तरह से उसमें धंस जाता है
चाहता तो है मुश्किलों से लड़ना
पर वक़्त के आगे हर जाता है
तमाम उम्र करता है कोशिशे
गुमनाम होकर अंत में मर जाता है
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )
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