निभाना नहीं चाहती थी....

निभाना नहीं चाहती थी मेरे साथ वो शायद रोज इसी लिए बहाने ढूंडा करती थी
भरोसा नहीं था उसको मेरे प्यार पर शायद इसी लिए गैरों की बातें किया करती थी
देखा था मैंने अक्सर उसको निगाहे चुराते हुए ना जाने किसके लिए दुआए किया करती थी
कर दिया था मैंने तो नाम उसके अपना सब कुछ इक वो थी जो फकत हमें अपना कहने से डरती थी
कलम :- हरमन बाजवा ( मुस्तापुरिया )

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