खुदा ने माँगा हिसाब था
दाव पर लगा ईमान था
लोग भी थे खिलाफ मेरे
और में बेजुबान था
क्या देता जवाब में
आखिर में भी इंसान था
इक इक करके जब उठे परदे
चुप चाप खड़ा परेशान था
रहमत थी खुदा की मुझ पर
हर वक़्त तो वो मेहरबान था
तो पूछा फिर खुदा ने
क्यूँ दामन तेरा नापाक था
सर न उठा पाया मैं
किस बात का करता गुमान था
नजरे ना मिला पाया के
बेगुनाही का न कोई निशान था
आखिर खता मानी अपनीं
इस बात का इतमिनान था
ना मिली सजा ना मुफ़ किया
जाने कैसा खुदा का इन्साफ था ..
कलम :- हरमन बजवा ( मुस्तापुरिया )
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